
मंडी: तुंगल क्षेत्र के प्रसिद्ध शक्तिपीठ माता बगलामुखी मंदिर सेहली में बुधवार को वार्षिक “जाग” का आयोजन हुआ। परंपरा के अनुसार इस जाग में देवताओं और डायनों के बीच हुए पौराणिक युद्ध का वर्णन किया जाता है। इस बार की कथा में सातवीं और अंतिम भिड़ंत में डायनों को जीत मिली बताई गई। गूर पर अवतरित होकर माता ने स्पष्ट किया कि डायनों की यह जीत केवल कथा भर नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के लिए चेतावनी के रूप में भी देखी जानी चाहिए। माना जा रहा है कि यदि इंसान प्रकृति और धार्मिक अनुशासन के साथ खिलवाड़ करता रहा तो भविष्य में भूकंप, बाढ़ और अकाल जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
श्रद्धालुओं काे रक्षा का दिया भराेसा, लेकिन साथ में चेतावनी भी
जाग के दौरान माता बगलामुखी ने भक्तों को भरोसा दिलाया कि वह हमेशा उनकी रक्षा करेंगी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि मनुष्य अपनी सीमाएं लांघेगा और प्राकृतिक संतुलन व देवनीति की अनदेखी करेगा, तो दुष्परिणाम और भी अधिक भयावह होकर सामने आ सकते हैं। माता ने यह भी उल्लेख किया कि देवस्थलों को केवल पूजा और साधना का स्थान बने रहना चाहिए। इन्हें पर्यटन की दृष्टि से भीड़भाड़ और शोरगुल में बदलना उचित नहीं है, क्योंकि देवता केवल शांत, स्वच्छ और पवित्र वातावरण में ही निवास करते हैं।
पूजा-अर्चना और भजनों से गूंजा मंदिर परिसर
जाग की शुरूआत रात ठीक 12 बजे माता की विधिवत पूजा से हुई। इसके बाद मंदिर परिसर भक्तिमय गीतों और भजनों से गूंज उठा। इस अवसर पर अग्नि भजन मंडली साईग्लू, नंदलाल भजन मंडली और शर्मा भजन मंडली सेहली की ओर से प्रस्तुत भजनों ने वातावरण को और अधिक आध्यात्मिक बना दिया।
पहला युद्ध समुद्र के टापू पर, अंतिम युद्ध घोघरधार में
माता बगलामुखी मंदिर से जुड़े पुजारी अमरजीत शर्मा ने बताया कि परंपरा के अनुसार देवताओं और डायनों के बीच कुल 7 युद्धों का जिक्र किया जाता है। पहला युद्ध समुद्र के टापू पर हुआ जबकि अंतिम युद्ध घोघरधार नामक स्थल पर लड़ा गया। इनमें से तीन-तीन लड़ाइयां बराबरी पर रहीं। अंतिम और सातवें संघर्ष में डायनों को प्रतीकात्मक रूप से विजय घोषित किया गया, क्योंकि वे शिख-पाथा लेकर गईं। इसी कारण इस वर्ष की कथा में उनका पलड़ा भारी बताया गया है।








