चम्बा: राधाष्टमी पर मणिमहेश की पावन डल झील में होने वाले ऐतिहासिक स्नान की परंपरा इस बार टूट गई। प्राकृतिक आपदा और रास्तों के अवरुद्ध होने के कारण श्रद्धालु पवित्र डुबकी लगाने से वंचित रह गए, लेकिन भक्ति का भाव निराशा से कहीं ऊपर रहा। यात्रा में आए शिवभक्तों ने चम्बा चौगान में ही देव चिह्नों की पूजा की, प्रसाद वितरित किया और सामूहिक भक्ति के वातावरण को जीवित रखा।
जम्मू-कश्मीर के डोडा और भद्रवाह सहित कई जिलों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने कहा कि उनका मन पवित्र झील में स्नान का था, परंतु परिस्थिति को उन्होंने ‘भोले बाबा की इच्छा’ मानकर स्वीकार कर लिया। चेहरे पर थोड़ा मलाल तो दिखा, लेकिन आस्था की मजबूती हर भाव पर भारी रही।
मणिमहेश ट्रस्ट डोडा के अध्यक्ष जगदीश ठाकुर सहित समिति के पदाधिकारियों और लंगर सेवा से जुड़े सदस्यों ने बताया कि यात्रा की परंपरा सिर्फ पैदल मार्ग नहीं, बल्कि अनुशासित भक्ति से जुड़ी होती है। हर पड़ाव पर पूजा-अर्चना करना उसी अनुशासन का हिस्सा है, जो कठिन हालात में भी यात्रियों की सुरक्षा और धैर्य बनाए रखता है।
पिछले एक हफ्ते से करीब 600 से 1200 श्रद्धालु पवित्र छड़ियों के साथ चौगान में ठहरे हुए हैं। अब अधिकांश लोग मौसम सुधरने के बाद ही वापसी की योजना बना रहे हैं। इस वर्ष का यह अनुभव उन्हें मणिमहेश यात्रा की कठिनाई और भक्ति दोनों का नया रूप दिखा गया है।








