असली धन वह नहीं जिसे तिजोरी में बंद रखा जाए, बल्कि वह है जो समाज के काम आए। इस कहावत को हिमाचल प्रदेश के जिला साेलन के अंतर्गत आते परवाणू के बागरिया दंपति ने अपने जीवन और मृत्यु दोनों से सच साबित कर दिया है। जीवनभर सादगी और समाज सेवा को अपना धर्म मानने वाले नरेंद्र व शशि बागरिया ने दुनिया को अलविदा कहने के बाद भी इंसानियत की ऐसी मिसाल कायम की है, जिसे सुनकर हर किसी की आंखें नम हैं और दिल में सम्मान का भाव है। इस नि:संतान दंपति ने अपनी लगभग 11 करोड़ रुपए की चल-अचल संपत्ति हिमाचल प्रदेश मुख्यमंत्री राहत कोष में दान कर दी है, ताकि यह पैसा जरूरतमंदों की मदद और समाज के कल्याण में खर्च हो सके।
जानकारी के अनुसार वर्ष 2019 जब उद्योगपति नरेंद्र बागरिया ने अपनी वसीयत लिखी ताे उन्होंने इसमें स्पष्ट लिखा था कि उनके निधन के बाद उनकी सारी संपत्ति की मालकिन उनकी पत्नी शशि बागरिया होंगी, लेकिन उनकी वसीयत में एक दिल छू लेने वाली शर्त भी थी कि जब उनकी पत्नी का भी निधन हो जाएगा तो यह पूरी संपत्ति समाज की भलाई के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करा दी जाए। नरेंद्र बागरिया का 2019 में निधन हो गया। इसके बाद अब 23 सितम्बर को उनकी पत्नी और सेवानिवृत्त प्रोफैसर शशि बागरिया भी इस दुनिया से चल बसीं। उनके निधन के साथ ही दंपति की अंतिम इच्छा के अनुसार उसकी लगभग 11 करोड़ की विरासत समाज के नाम हो गई।
बागरिया दंपति परवाणू के प्रतिष्ठित नागरिकों में से थे। नरेंद्र बागरिया की एक कंपनी थी, जो आइशर ट्रैक्टर के लिए उपकरण और पेंट बनाने का काम करती थी, जबकि उनकी पत्नी शशि कॉलेज में प्रोफैसर थीं। करोड़ों की संपत्ति के मालिक होने के बावजूद उनका जीवन बेहद सादगी भरा था। उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत विलासिता या दिखावे पर पैसा खर्च नहीं किया। उनकी कोई संतान नहीं थी, लेकिन उन्होंने समाज के हर जरूरतमंद को अपना माना और हमेशा दूसरों की मदद के लिए आगे रहे। उनकी यही सोच उनकी वसीयत में भी झलकती है, जो केवल संपत्ति का हस्तांतरण नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के प्रति उनके गहरे प्रेम और सेवा भाव का प्रमाण है।
दंपति के केयरटेकर ने उनकी अंतिम इच्छा की जानकारी स्थानीय प्रशासन को दी। सूचना मिलते ही उपायुक्त सोलन ने तहसीलदार कसौली को वसीयत के अनुसार संपत्ति को मुख्यमंत्री राहत कोष में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दे दिए हैं। इस संपत्ति में नकदी, मकान, जमीन, कार, बैंक लॉकर और कीमती आभूषण शामिल हैं।
इस खबर के सामने आते ही पूरे प्रदेश में बागरिया दंपति की चर्चा हो रही है। लोग उनके इस महादान से अभिभूत हैं। सच ही कहा है किसी ने कि “इंसान पैसों से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से अमर होता है”। बागरिया दंपति ने जो किया है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणास्रोत है। वे भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें और उनका यह महान कार्य हमेशा जीवित रहेगा। लाेगाें मांग कर रहे हैं कि सरकार बागरिया दंपति कि याद में एक स्मारक या यादगार स्थल जरूर बनाए, ताकि लोग उनके नि:स्वार्थ सेवा भाव को हमेशा याद रखें।








