रविवार का दिन रोहड़ू के लिए किसी त्याैहार से कम नहीं था। हवा में ढोल-नगाड़ों की गूंज थी, लोगों के हाथों में फूलों की मालाएं थीं और हर चेहरे पर गर्व की एक अनोखी चमक थी। यह जश्न था अपनी बेटी के घर लौटने का, उस बेटी का जिसने एक छोटे से गांव से निकलकर पूरी दुनिया में भारत का तिरंगा लहराया। विश्व कप विजेता भारतीय महिला क्रिकेट टीम की तूफानी गेंदबाज रेणुका सिंह ठाकुर जब अपने घर पहुंचीं तो पूरे क्षेत्र ने उन्हें पलकों पर बिठा लिया।
माता हाटेश्वरी के मंदिर परिवार सहित टेका माथा
इससे पहले कि वो लोगों के हुजूम से मिलतीं, रेणुका ने एक बेटी का फर्ज निभाया। अपनी मां सुनीता ठाकुर और परिवार के साथ वह सीधे माता हाटेश्वरी के मंदिर पहुंचीं। वहां उन्होंने मां के चरणों में सिर झुकाकर उस शक्ति का धन्यवाद किया, जिसने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचने का हौसला दिया। मंदिर से लौटते ही रोहड़ू में हजाराें लोगों का हुजूम अपनी “पहाड़ की शेरनी” का इंतजार कर रहा था। जैसे ही रेणुका की गाड़ी पहुंची ताे पूरा माहौल “रेणुका-रेणुका” के नारों से गूंज उठा। स्थानीय प्रशासन और विधायक ने उन्हें शॉल, टोपी और स्मृतिचिन्ह देकर सम्मानित किया, लेकिन सबसे खास पल वो था जब लोगों ने प्यार से उनके सिर पर चांदी का मुकुट सजाया। यह मुकुट सिर्फ चांदी का नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों के भरोसे और गर्व का प्रतीक था।
आंखों में नमी और लबों पर अपनों का शुक्रिया
जब रेणुका ने माइक थामा तो उनकी आवाज में सफर का संघर्ष और अपनों का आभार साफ़ झलक रहा था। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि आज मैं जो कुछ भी हूं, अपने चाचा भूपिंदर सिंह ठाकुर और अपने मामा की वजह से हूं। उन्होंने उस दौर को याद किया जब वह महज 3 साल की थीं और पिता का साया सिर से उठ गया था। उस मुश्किल घड़ी में उनके चाचा ने ही उनमें छिपे हुनर को पहचाना। वही थे जिन्होंने 13 साल की रेणुका का हाथ पकड़कर उन्हें धर्मशाला क्रिकेट अकादमी तक पहुंचाया। रेणुका ने कहा कि मेरे मामा ने बचपन से आज तक मेरा साथ दिया है, उनके इस अहसान को मैं कभी नहीं भूल सकती। ये शब्द सुनकर वहां मौजूद उनके चाचा और मामा की आंखें भी नम हो गईं।
गांव पारसा में जश्न, लाेगाें ने लिया पारंपरिक धाम का आनंद
रोहड़ू के बाद रेणुका का काफिला उनके पैतृक गांव पारसा की ओर बढ़ा, जहां का नजारा देखने लायक था। पूरा गांव अपनी लाडली के इंतजार में सुबह से सड़कों पर था। गांव पहुंचते ही रेणुका का ऐसा भव्य अभिनंदन हुआ कि मानो कोई दीवाली हो। लोगों ने नाच-गाकर जश्न मनाया और अपनी बेटी को सिर आँखों पर बिठा लिया। इस खुशी के मौके पर पूरे गांव के लिए पारंपरिक धाम (सामूहिक भोज) का आयोजन किया गया, जिसमें हज़ारों लोगों ने एक साथ बैठकर अपनी बेटी की कामयाबी का जश्न मनाया।








