सड़क किनारे एक छोटी-सी दुकान, टायरों की कालिख से सने हाथ और चेहरे पर हर मौसम की मार के निशान… लेकिन इन सबके पीछे एक ऐसी मुस्कान है जिसमें बच्चों के भविष्य की चमक दिखाई देती है। यह कहानी है सोलन के चमाकड़ीपुल पर ‘मोटू अंकल’ के नाम से मशहूर अनिल जी की, जिनकी जिंदगी संघर्ष और त्याग की एक जीती-जागती मिसाल है।
पिछले 40 सालों से अनिल जी टायर पंक्चर लगाने का काम कर रहे हैं। सूरज की तपिश हो या हड्डियों को कंपा देने वाली ठंड, उन्होंने हर मुश्किल को हंसकर झेला। उनका मकसद सिर्फ एक था…अपने बच्चों को वह जिंदगी देना, जिसका उन्होंने शायद खुद कभी सपना भी नहीं देखा था। आज उनकी मेहनत रंग लाई है। दो-दो पैसे जोड़कर उन्होंने अपने बच्चों को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जहां वे लाखों-करोड़ों कमाने के काबिल बन गए हैं।
उनकी तीन बेटियां और एक बेटा है। एक बेटी डॉक्टर है, दूसरी एमबीए (MBA) प्रोफैशनल है और तीसरी बेटी साइबर सिक्योरिटी (Cyber Security) की पढ़ाई कर रही है। बेटा अभी शिमला में 12वीं में है और अनिल जी का सपना है कि उसे भी MBA करवाएंगे।

इस पिता के संघर्ष की गहराई का अंदाजा उस एक पल से लगाया जा सकता है, जब उनकी छोटी बेटी ने मासूमियत से पूछा कि पापा, आप हमेशा काले क्यों रहते हैं? इस सवाल पर अनिल जी का जवाब किसी भी पत्थर दिल इंसान को पिघला सकता है। उन्होंने कहा कि बेटा, मेरा नसीब ही काला है, लेकिन मैं तुम्हारी किस्मत चमका कर रहूंगा और आज उन्होंने यह सच कर दिखाया है।
अनिल जी आज भी चमाकड़ीपुल से कुछ दूर एक छोटे से ढारे (शैड) में रहते हैं और वहीं अपनी दुकान चलाते हैं। उनकी दुकान के सामने से गुजरने वाला शायद ही कोई ट्रक या बस ड्राइवर हो जो उन्हें न जानता हो। उनकी ईमानदारी और मेहनत की सब मिसाल देते हैं। दिनभर की कमाई से जो भी चार पैसे आते हैं, वे हर शाम गूगल पे के जरिए सीधे अपने बच्चों के खातों में भेज देते हैं। अपने लिए कुछ नहीं बचाते, बस बच्चों के सपनों को पूरा होता देख खुश रहते हैं।
यहां क्लिक कर देखें वीडियो…
अनिल जी की कहानी हमें सिखाती है कि महान बनने के लिए बड़े शहरों या बड़ी डिग्रियों की जरूरत नहीं होती, बल्कि एक बड़ा दिल और फौलादी इरादे चाहिए। उनके हाथ भले ही कालिख से काले हों, लेकिन उनके इरादे सोने से भी ज्यादा चमकदार हैं।
यह कहानी उन तमाम लोगों के लिए एक करारा जवाब है जो अक्सर कहते हैं कि पंक्चर ही तो लगाते हो… क्या खाओगे? बच्चों को क्या पढ़ाओगे? अनिल जी ने साबित कर दिया है कि एक पिता की इच्छाशक्ति के आगे कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती।
सलाम है इस पिता को, जो अपने बच्चों के सपनों को पूरा करने में खुद को भूल गया। जिन्होंने अपनी जिंदगी की कालिख से अपने बच्चों के भविष्य में सुनहरे रंग भर दिए। वाकई, बाप जैसा दुनिया में कोई नहीं।








