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IGMC कांड: हिमाचल में स्वास्थ्य सेवाएं ठप्प, सामूहिक अवकाश पर गए ‘धरती के भगवान’, मरीजाें का बुरा हाल

हिमाचल प्रदेश की वादियों में आज कड़ाके की ठंड है, लेकिन अस्पतालों का माहौल बेहद गर्म और तनावपूर्ण है। राज्य की स्वास्थ्य सेवाएं आज वेंटिलेटर पर नजर आ रही हैं। वजह है ‘धरती के भगवान’ कहे जाने वाले डॉक्टरों का सामूहिक अवकाश पर चले जाना। इसका सीधा और सबसे दर्दनाक असर उन बेबस मरीजों पर पड़ा है, जो सुबह की पहली किरण के साथ जीवन की उम्मीद लेकर आईजीएमसी शिमला और प्रदेश के अन्य अस्पतालों की दहलीज पर पहुंचे थे।

अस्पतालों के गलियारों में आज इलाज नहीं, सिर्फ इंतजार बिखरा पड़ा है। आईजीएमसी शिमला पहुंचे दिल की बीमारी से जूझ रहे एक मरीज को उम्मीद थी कि डॉक्टर उसका दर्द कम करेंगे, लेकिन ओपीडी खाली देखकर उन्हें बिना इलाज के भारी मन से घर लौटना पड़ा। वहीं 10 दिनों से रिपन अस्पताल में भर्ती एक महिला मरीज काे आईजीएमसी में एमआरआई करवानी थी। दर्द और बीमारी के बीच सफर तय करके वे आईजीएमसी पहुंचीं तो पता चला कि हड़ताल है। अब उसे फिर से नई तारीख लेनी होगी। उसका सवाल सिस्टम से बस इतना है कि इसमें मेरा क्या कसूर था?

इस हड़ताल की जड़ें 22 दिसम्बर की उस घटना से जुड़ी हैं, जब आईजीएमसी में डॉ. राघव निरूला और एक मरीज के बीच मारपीट का वीडियो वायरल हुआ था। सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए डॉक्टर को टर्मिनेट (बर्खास्त) कर दिया। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि सरकार ने केवल एकतरफा कार्र्वाई कीोो है। सैमडकोट एसोसिएशन के महासचिव डॉ. पियूष कपिला ने सवाल उठाया कि जांच रिपोर्ट में दोनों गलत थे तो सजा सिर्फ डॉक्टर को क्यों? मरीज को सुपर स्पैशल वार्ड का सुख मिला और डॉक्टर को बर्खास्तगी का दुख। जिस भीड़ ने डॉक्टर को मारने और देश छोड़ने की धमकी दी, वो आज भी आजाद है। क्या डॉक्टर होना गुनाह है?

डॉक्टरों का साफ कहना है कि कार्यस्थल पर सुरक्षा और सम्मान के बिना काम करना अब मुमकिन नहीं है। उन्हें लगता है कि भीड़तंत्र के आगे प्रशासन ने घुटने टेक दिए हैं। मामला अब तूल पकड़ चुका है। आईजीएमसी के रैजीडैंट डॉक्टरों के समर्थन में एम्स दिल्ली के डॉक्टर, हिमाचल मेडिकल ऑफिसर एसोसिएशन और मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन भी उतर आए हैं।

इस वक्त पूरे प्रदेश की नजरें मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के सरकारी आवास ओक ओवर पर टिकी हैं, जहां इस संकट को सुलझाने के लिए मैराथन मीटिंग हाे रही है। यह मीटिंग सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि हजारों मरीजों की सांसों की डोर है। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे।

फिलहाल, स्थिति यह है कि मरीज दर्द से कराह रहे हैं और डॉक्टर अपने आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक बहस जारी है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार डॉक्टरों के गुस्से और मरीजों की जरूरत के बीच कोई मानवीय रास्ता निकाल पाती है या नहीं। तब तक, पहाड़ पर मरीज भगवान भरोसे हैं।

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Author: Desk

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