हिमाचल प्रदेश की वादियों में जिस भांग को अब तक केवल नशे और बदनामी का कारण माना जाता था, अब वही पौधा राज्य की तकदीर बदलने जा रहा है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने एक नई सोच के साथ ‘ग्रीन टू गोल्ड’ पहल की शुरूआत की है। इसका मकसद भांग के पौधे को नशे के कलंक से मुक्त कर, इसे राज्य की आर्थिकी और औद्योगिक विकास की रीढ़ बनाना है।
किसानों के लिए उम्मीद की किरण
पहाड़ के किसानों के लिए यह फैसला किसी वरदान से कम नहीं है। हिमाचल के किसान अक्सर जंगली जानवरों द्वारा फसल बर्बाद करने और पानी की कमी से जूझते रहे हैं। भांग की यह वैज्ञानिक खेती इन दोनों समस्याओं का हल है। इसे उगाने में बहुत कम पानी लगता है और जंगली जानवर इसे नुक्सान नहीं पहुंचाते। अब किसान बिना किसी डर के अपनी मेहनत का पूरा फल पा सकेंगे।
नशा नहीं, निर्माण होगा
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह खेती पूरी तरह सुरक्षित और वैज्ञानिक होगी। इसमें नशे का तत्व नाममात्र (0.3% से कम) होगा, जिससे इसका गलत इस्तेमाल नामुमकिन है। अब इस पौधे से नशा नहीं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल कपड़े, कागज, दवाइयां और बायो-प्लास्टिक जैसे उत्पाद बनेंगे। यह पहल नशा माफिया पर चोट करेगी और कमाई का सीधा रास्ता किसानों के घर तक ले जाएगी।
सुनहरे भविष्य की ओर कदम
इस एक साहसिक फैसले से हिमाचल के खजाने में सालाना 2000 करोड़ रुपए तक आने की उम्मीद है, लेकिन यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है, यह हिमाचल के युवाओं को रोजगार देने का और 2032 तक प्रदेश को देश का सबसे समृद्ध राज्य बनाने का सपना है। ‘ग्रीन टू गोल्ड’ हिमाचल की आत्मनिर्भरता और खुशहाली की एक नई कहानी लिखने को तैयार है।








