हिमाचल प्रदेश की रमेशू देवी और नेहा ने कभी नहीं सोचा था कि उनकी कला देश के सबसे बड़े मंदिर तक पहुंचेगी और खुद प्रधानमंत्री उनके हुनर के मुरीद हो जाएंगे। रमेशू देवी और नेहा द्वारा बनाई गईं ‘पूलें’ अब काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारियाें के चरणाें की शाेभा बढ़ाएंगी, उन्हें ठंड से भी बचाएंगी।
इसकी शुरुआत तब हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सर्दियों के समय काशी दौरे पर थे, तो उनकी नजर उन पुजारियों पर पड़ी जो कड़ाके की ठंड और धुंध के बीच सिर्फ अपनी आस्था के सहारे नंगे पैर मंदिर में पूजन और अनुष्ठान कर रहे थे। मंदिर की पवित्रता के कारण वहां चमड़े या रबर के जूते-चप्पल पहनना वर्जित है। पुजारियों की इस निःस्वार्थ भक्ति और उनके कष्ट को देखकर प्रधानमंत्री द्रवित हो गए। उनके मन में पुजारियों के लिए कुछ ऐसा करने का विचार आया जो धार्मिक मर्यादा के अनुकूल भी हो और उन्हें ठंड से भी बचाए। तभी उन्हें हिमाचल की उन पारंपरिक ‘पूलों’ की याद आई, जिन्हें पवित्र माना जाता है और धार्मिक कार्यों में पहना जा सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने तुरंत हिमाचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को फोन लगाया। उन्होंने सराज की इन महिलाओं द्वारा बनाई जाने वाली इन खास पूलों के बारे में बात की और पुजारियों के लिए पूलें भेजने का आग्रह किया. साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया “पूलें भेजिए और बिल भी।” जयराम ठाकुर ने इसे प्रधानमंत्री की ओर से एक भेंट मानकर पूलें तो तुरंत भिजवा दीं, लेकिन सम्मानवश बिल नहीं भेजा। कुछ दिन बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से फिर फोन आया। इस बार संदेश साफ और दृढ़ था। प्रधानमंत्री का कहना था कि जयराम जी, आपको ये बिल भेजना ही पड़ेगा। ये मेरा आदेश है और मैं दूसरी बार नहीं बोलता। यह आग्रह सिर्फ एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि हिमाचल के छोटे से गांव में मेहनत कर रहीं उन महिलाओं के श्रम का सम्मान था। प्रधानमंत्री यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि उन कारीगरों को उनके हुनर का सही मूल्य मिले।
मंडी जिले के सराज क्षेत्र की रमेशू देवी और नेहा जैसी कई महिलाएं महिला मंडलों से जुड़ी हैं। वे घर के काम के साथ-साथ भांग और बिहुल के रेशों को घंटों मेहनत कर इन पूलों में तब्दील करती हैं। अब तक इनकी मांग स्थानीय स्तर पर ही थी। इसमें मेहनत ज्यादा और कमाई कम होने के बावजूद, यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी जिंदा है, लेकिन अब प्रधानमंत्री की इस एक पहल ने उनकी कला को दिल्ली से होते हुए सीधा काशी विश्वनाथ तक पहुंचा दिया है।








