वेब स्टोरी

ई-पेपर

लॉग इन करें

‘हिमाचलियत’ की मिसाल: गर्भवती महिला के लिए HRTC बस बनी लेबर रूम और मुसाफिर बने डॉक्टर, फिर ‘लक्ष्मी’ का हुआ आगमन

देवभूमि हिमाचल अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए तो जाना ही जाता है, लेकिन यहां के लोगों की सादगी और मददगार स्वभाव जिसे ‘हिमाचलियत’ कहा जाता है उसका कोई सानी नहीं है। सिरमौर जिले के नाहन से एक ऐसा ही दिल छू लेने वाला वाकया सामने आया है, जहां एक चलती HRTC बस अचानक डिलीवरी रूम में तब्दील हो गई और अनजान मुसाफिरों ने फरिश्ते बनकर एक नन्ही जान को इस दुनिया में लाने में मदद की।

दरअसल, यह घटना कुंहट-हरिपुरधार-रेणुकाजी-नाहन रूट पर चलने वाली एचआरटीसी (HRTC) बस की है। शुक्रवार शाम मलगांव के पास सरोज नाम की एक गर्भवती महिला अपने पति और सास के साथ नाहन मेडिकल कॉलेज जाने के लिए बस में सवार हुई। डॉक्टरों ने डिलीवरी की तारीख कुछ दिन बाद की दी थी और घर से निकलते वक्त सरोज बिल्कुल सामान्य थीं। परिवार बस की सबसे पिछली सीट पर बैठा था, लेकिन रात करीब 8 बजे जब बस दोसड़का के पास पहुंची, तो सरोज को अचानक तेज प्रसव पीड़ा होने लगी।

दर्द इतना तेज था कि अस्पताल पहुंचने का वक्त नहीं था। ऐसे मुश्किल वक्त में बस के ड्राइवर, कंडक्टर और सवारियों ने जो किया, वह समाज के लिए एक बेहतरीन मिसाल है। महिला की हालत देखते ही बस में मौजूद सभी पुरुष यात्री शालीनता का परिचय देते हुए तुरंत आगे की सीटों पर चले गए।

ड्राइवर और कंडक्टर ने समझदारी दिखाते हुए बस के पिछले हिस्से में एक अस्थायी पर्दा कर दिया, ताकि महिला को कोई असहजता न हो। इसके बाद बस में मौजूद महिलाएं आगे आईं और उन्होंने डॉक्टर व नर्स की भूमिका निभाते हुए मोर्चा संभाल लिया। पिछली सीट डिलीवरी टेबल बन गई और महिलाओं के सहयोग से सरोज ने बस में ही एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया। बस में नन्ही ‘लक्ष्मी’ की किलकारी गूंजते ही पूरे माहौल में खुशी की लहर दौड़ गई।

इसी बीच बस में सवार एक जागरूक यात्री ने 108 एंबुलेंस को सूचना दे दी थी। उधर, ड्राइवर ने भी सूझबूझ और इंसानियत दिखाते हुए बस को नाहन की तरफ तेजी से दौड़ाया। बनोग के पास बस और एंबुलेंस आमने-सामने मिले, जिसके बाद मां और नवजात बेटी को सुरक्षित एंबुलेंस में शिफ्ट कर नाहन मेडिकल कॉलेज पहुंचाया गया।

फिलहाल मां और नन्ही परी दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं। सच ही कहा गया है कि जन्म और मरण का समय केवल ईश्वर के हाथ में होता है। इंसान भले ही कितनी तारीखें तय कर ले, लेकिन जब नई जान को दुनिया में आना होता है, तो वह अपना रास्ता खुद बना लेती है। इस पूरी घटना में जिस तरह से एचआरटीसी के स्टाफ और अनजान यात्रियों ने एक परिवार को संभाला, उसने साबित कर दिया कि इंसानियत आज भी जिंदा है। संकट की इस घड़ी में मदद का हाथ बढ़ाने वाले उन तमाम यात्रियों, महिलाओं और बस स्टाफ के जज्बे को हमारा सलाम है।

Desk
Author: Desk

Leave a Comment

और पढ़ें
और पढ़ें
error: Content is protected !!