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Video: जिस हरीश राणा को मिली इच्छामृत्यु, हिमाचल से है उसका नाता, कांगड़ा में है पुश्तैनी घर

“मौत तो यूं ही बदनाम है, इंसान को असली दर्द तो जिंदगी देती है…” ये लाइनें हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले से ताल्लुक रखने वाले हरीश राणा और उसके परिवार पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। 13 साल से बिस्तर पर जिंदा लाश बनकर पड़े हरीश राणा को आखिरकार अदालत से इच्छामृत्यु की अनुमति मिल गई है। वह इस वक्त दिल्ली के एम्स अस्पताल में अपनी आखिरी सांसों का इंतजार कर रहा है। जैसे ही यह खबर हिमाचल पहुंची कि हरीश इसी माटी का खून है, तो कांगड़ा स्थित उसके पैतृक गांव पलेटा में मातम पसर गया।

खामोश है कांगड़ा का वो आंगन, जहां कभी गूंजती थी हरीश की हंसी

हरीश का परिवार वैसे तो दिल्ली शिफ्ट हो गया था, लेकिन कांगड़ा में आज भी उनका पुश्तैनी घर और जमीन है। आज यह घर बंद पड़ा है। खिड़कियां सूनी हैं और हवाओं में एक अजीब सा सन्नाटा और मातम है। यह वही आंगन है, जहां कभी हरीश बचपन में खेलता था। उसकी हंसी से यह घर खिलखिलाता था। हरीश कभी इन गलियों और गांव के रास्तों से गुजरा करता था, लेकिन आज ये रास्ते भी उसके गम में बिल्कुल चुप हैं। कोरोना महामारी के दौरान जब पूरी दुनिया में खौफ था, तब हरीश के माता-पिता उसे दिल्ली से कांगड़ा के इसी घर में ले आए थे। बेटे की हालत पहले से ही बेहद खराब थी और वे उसे हर हाल में संक्रमण से बचाना चाहते थे।

बेटे को बचाने के लिए बिक गया 3 मंजिला बंगला, सड़क पर बेचा सैंडविच

हरीश की कहानी सिर्फ एक हादसे की नहीं, बल्कि एक मां-बाप के उस संघर्ष की कहानी है, जिसमें उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। 13 साल पहले हुए एक भयानक हादसे ने नौजवान हरीश की जिंदगी को बिस्तर तक सीमित कर दिया। बेटे को ठीक करने की आस में इस परिवार ने अपना 3 मंजिला आलीशान बंगला तक बेच दिया। पानी की तरह पैसा बहाया। एक समय का करोड़पति परिवार बेटे के इलाज के चक्कर में सड़क पर आ गया। नौबत यहां तक आ गई कि हरीश की दवाइयों का खर्च उठाने के लिए उसके बुजुर्ग माता-पिता को सड़क किनारे सैंडविच तक बेचने पड़े। उनके हाथ खाली हो गए, लेकिन बेटे की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। अब बस हिमाचल का यह पुश्तैनी घर ही उनके पास बचा है।

माता-पिता ने रोते हुए बेटा को मुक्ति के रास्ते पर भेजा

पिछले 13 सालों से माता-पिता हरीश के ठीक होने की दुआएं मांग रहे थे, लेकिन जब यह साफ हो गया कि उनका लाडला अब कभी नहीं उठ पाएगा और उसका दर्द बर्दाश्त के बाहर हो गया, तो यही दुआएं उनके लिए सबसे बड़ा दर्द बन गईं। हारकर माता-पिता ने अपने ही कलेजे के टुकड़े के लिए अदालत से मौत (इच्छामृत्यु) की गुहार लगाई। जब कोर्ट ने इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी, तो पत्थर हो चुके मां-बाप की आंखों से आंसू छलक पड़े। रोते हुए उन्होंने अपने बेटे से कहा कि “बेटा, तू सम्मान से मुक्ति के रास्ते पर जा रहा है।”

किस्मत के आगे हार गया प्यार

यह कहानी सिर्फ एक बीमार बेटे की नहीं है, यह उन माता-पिता की दास्तान है, जो किस्मत के आगे सब कुछ हार गए। कांगड़ा का यह बंद पड़ा घर आज गवाह है उस बेशुमार प्यार का, उस अथाह संघर्ष का और उस अंतहीन दर्द का… जिसे शब्दों में बयां कर पाना मुमकिन नहीं है। आज पूरा हिमाचल अपने इस बेटे की दर्दनाक विदाई पर आंसू बहा रहा है।

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Author: Desk

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