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हिमाचल: नशे में ड्यूटी और छात्रों से दुर्व्यवहार पड़ा महंगा, शिक्षा विभाग ने TGT शिक्षक को सिखाया कड़ा सबक

हिमाचल प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था की साख और शिक्षकों के आचरण को लेकर शिक्षा विभाग ने एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। विद्यार्थियों के साथ दुर्व्यवहार, ड्यूटी से नदारद रहने और नशे की हालत में स्कूल आने के गंभीर आरोपों के सिद्ध होने पर कांगड़ा जिले के एक सरकारी शिक्षक को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई है। यह कार्रवाई राजकीय उच्च विद्यालय कंड, जिला कांगड़ा में कार्यरत टीजीटी (नॉन मेडिकल) मोहिंदर सिंह के खिलाफ की गई है। शिक्षा निदेशक आशीष कोहली द्वारा जारी आदेश के अनुसार शिक्षक को 31 जुलाई 2026 से अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त माना जाएगा।

विभाग के अनुसार संबंधित शिक्षक पर केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1965 के तहत विभागीय जांच बैठाई गई थी। विभागीय रिकॉर्ड और जांच में पाया गया कि शिक्षक कई बार शराब पीकर स्कूल पहुंचे। इसके अलावा उन पर बिना पूर्व अनुमति ड्यूटी से गायब रहने, सरकारी कामकाज की अनदेखी करने और छात्रों के साथ मारपीट व अभद्र व्यवहार करने के आरोप लगे। शिक्षा विभाग ने इसे सरकारी कर्मचारी आचरण नियमों का गंभीर उल्लंघन माना।

जांच प्रक्रिया के दौरान शिक्षक मोहिंदर सिंह ने सभी आरोपों को सिरे से नकार दिया। उन्होंने बचाव में तर्क दिया कि उन्होंने लंबे समय तक राज्य के दुर्गम और कठिन क्षेत्रों में ईमानदारी से सेवाएं दी हैं। शिक्षक ने दावा किया कि वे पैंक्रियाटाइटिस और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे हैं। साथ ही उन्होंने शिकायत को दुर्भावनापूर्ण बताते हुए वीडियो साक्ष्यों को छेड़छाड़ किया हुआ करार दिया।

हालांकि, विभागीय जांच अधिकारी ने दस्तावेजों और गवाहों के बयानों का गहन परीक्षण करने के बाद इन दलीलों को खारिज कर दिया। जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि बीमारी का हवाला देकर शराब के नशे में स्कूल आने या छात्रों से मारपीट करने को सही नहीं ठहराया जा सकता। इसके अलावा, शिक्षक वीडियो साक्ष्यों को फर्जी साबित करने के लिए कोई भी तकनीकी या विश्वसनीय प्रमाण पेश नहीं कर सके।

इस मामले का सबसे अहम पहलू सजा का निर्धारण रहा। शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया कि एक शिक्षक समाज के लिए नैतिकता और अनुशासन का आदर्श होता है, इसलिए ऐसे आचरण को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। हालांकि, जांच में शिक्षक पर किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता या भ्रष्टाचार का आरोप सिद्ध नहीं हुआ। इसी तकनीकी आधार पर विभाग ने उन्हें सेवा से बर्खास्त करने के बजाय, सीसीएस (सीसीए) नियम, 1965 के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति का दंड देना उचित समझा। इसका अर्थ यह है कि नौकरी से हटाए जाने के बावजूद शिक्षक को नियमानुसार पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ मिलते रहेंगे।

शिक्षा विभाग की इस कार्रवाई को प्रदेश के अन्य कर्मचारियों और शिक्षकों के लिए एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि कार्यस्थल पर अनुशासनहीनता किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी।

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Author: Desk

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