हिमाचल से चंडीगढ़ के बीच सफर को प्रदूषण मुक्त बनाने की एचआरटीसी (HRTC) की नई पहल अब दो राज्यों के परिवहन विभागों के बीच कोल्ड वॉर का कारण बन गई है। पर्यावरण को बचाने के लिए शिमला-चंडीगढ़ रूट पर उतारी गई एचआरटीसी की नई इलेक्ट्रिक बस का चंडीगढ़ में स्वागत होने के बजाय, इसे लालफीताशाही का सामना करना पड़ा। चंडीगढ़ ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग (CTU) की इस कार्रवाई के बाद अब हिमाचल में भी जैसे को तैसा की रणनीति पर विचार शुरू हो गया है।
जानकारी के अनुसार शुक्रवार को जब डीजल बस के शोर और धुएं की जगह एचआरटीसी की शांत और पर्यावरण अनुकूल ई-बस सवारियों को लेकर चंडीगढ़ पहुंची, तो वहां सीटीयू के अधिकारियों ने इसका रास्ता रोक लिया। बस को करीब एक घंटे तक रोककर रखा गया। अधिकारियों ने चालक-परिचालक से पूछताछ शुरू कर दी और ई-बस के संचालन के लिए नए परमिट का फरमान सुना दिया। जबकि वास्तविकता यह थी कि एचआरटीसी ने यह बस किसी नए रूट पर नहीं, बल्कि नियमित रूप से चल रही डीजल बस को रिप्लेस करके ट्रायल के तौर पर भेजी थी।
चंडीगढ़ प्रबंधन के इस रवैये ने एचआरटीसी कर्मचारियों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। एचआरटीसी कंडक्टर यूनियन के प्रदेशाध्यक्ष प्रीत महेंद्र ने सीटीयू की इस कार्रवाई को पूरी तरह से अतार्किक करार दिया है। उन्होंने कड़ा एतराज जताते हुए स्पष्ट किया कि निगम ने कोई नया रूट इजाद नहीं किया है, शिमला-चंडीगढ़ रूट पहले से ही स्वीकृत है। यूनियन का तर्क है कि जब परमिट उसी रूट का है, तो बस का प्रकार बदलने पर कर्मचारियों को रोकना समझ से परे है।
इस एक घंटे की रोकटोक ने अब एक बड़े अंतर्राज्यीय परिवहन विवाद का रूप ले लिया है। यूनियन के अध्यक्ष सीटीयू प्रबंधन को दोटूक अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर भविष्य में एचआरटीसी की बसों को चंडीगढ़ में बेवजह रोककर कर्मचारियों को परेशान किया गया, तो हिमाचल के कर्मचारी भी चुप नहीं बैठेंगे। उन्होंने चेतावनी दी है कि ऐसी स्थिति में जवाबी कार्रवाई करते हुए सीटीयूकी किसी भी बस को हिमाचल प्रदेश की सीमा में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा। यूनियन ने साफ कर दिया है कि अगर यह नौबत आई, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ सीटीयू प्रबंधन की होगी।








