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देश पर कुर्बान हिमाचल के लाल काे सैन्य सम्मान के साथ दी अंतिम विदाई, ‘शहीद बलदेव चंद अमर रहे’ के नारों से गूंजा गांव

रविवार का दिन बिलासपुर के गंगलोह गांव के लिए गर्व और गम का एक ऐसा सैलाब लेकर आया, जिसे शायद ही कोई भुला पाएगा। माहौल में एक तरफ जहां भारत माता के वीर सपूत को खोने का मातम था, तो वहीं दूसरी ओर उसकी शहादत पर गर्व से हर किसी का सीना चौड़ा था। जम्मू-कश्मीर के ऊधमपुर में आतंकियों से लोहा लेते हुए देश पर कुर्बान हुए लांस दफेदार बलदेव चंद का पार्थिव शरीर जब तिरंगे में लिपटकर उनके पैतृक गांव पहुंचा, तो हर आंख नम हो गई।

जैसे ही सेना का वाहन शहीद के पार्थिव शरीर को लेकर गांव में दाखिल हुआ ताे गांव के युवाओं ने अपने हीरो के सम्मान में बाइक पर तिरंगा रैली निकाली। घर पर मां, पत्नी और अन्य परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था, जिन्हें संभालना हर किसी के लिए मुश्किल हो रहा था। जैसे ही शहीद का पार्थिव शरीर घर पहुंचा ताे पत्नी ताबूत से लिपट गई और फूट-फूट कर राेती रही। वहीं शहीद की मां का भी बुरा हाल था। फिर जैसे ही शहीद के पार्थिव शरीर काे अंतिम संस्कार के लिए ले जाने लगे ताे पूर इलाका “भारत माता की जय” और “शहीद बलदेव चंद अमर रहे” के नारों से गूंज उठा।

गांव के श्मशानघाट में पूरे सैन्य सम्मान के साथ शहीद बलदेव चंद का अंतिम संस्कार किया गया। सेना की टुकड़ी ने उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया। सबसे हृदय विदारक क्षण वह था, जब शहीद के 7 साल के मासूम बेटे ईशान ने अपने चाचा दिनेश कुमार के साथ कांपते हाथों से पिता की चिता को मुखाग्नि दी। उस मासूम को शायद यह भी नहीं पता था कि जिस पिता के कंधे पर बैठकर वह मेला घूमने के सपने देखता था, आज वह उन्हें अंतिम विदाई दे रहा है। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर किसी का कलेजा फट पड़ा।

बता दें कि लांस दफेदार बलदेव चंद (4 राष्ट्रीय राइफल्स) जम्मू-कश्मीर के ऊधमपुर के दुर्गम डुडु-बसंतगढ़ इलाके में सेना और पुलिस के एक विशेष तलाशी अभियान का हिस्सा थे। शुक्रवार रात को सेओज धार के घने जंगलों में छिपे आतंकवादियों ने सुरक्षाबलों की टुकड़ी पर अचानक गोलीबारी शुरू कर दी। बलदेव चंद ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए आतंकियों का डटकर मुकाबला किया, लेकिन इस भीषण मुठभेड़ में वह गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तत्काल चिकित्सा सहायता दी गई, लेकिन जख्म इतने गहरे थे कि देश का यह बहादुर बेटा मां भारती की गोद में हमेशा के लिए सो गया।

देश सेवा का जज्बा बलदेव चंद को विरासत में मिला था। उनके पिता बिशन दास भी सेना से हवलदार के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। उनके ताया और चाचा ने भी सेना में रहकर देश की सेवा की है। बलदेव खुद वर्ष 2011 में सेना में भर्ती हुए थे और अपनी बहादुरी और लगन के लिए जाने जाते थे। वह अपने पीछे 7 साल का बेटा ईशान, पत्नी, मां-बाप और एक भाई को छोड़ गए हैं।

शहीद के पिता सेवानिवृत्त हवलदार बिशन दास ने अपने आंसुओं को रोकते हुए कहा कि बेटे को खोने का गम तो जिंदगी भर रहेगा, लेकिन मुझे इस बात पर गर्व भी है कि मेरा बेटा डरकर या भागकर नहीं, बल्कि दुश्मनों से लड़ते हुए देश के काम आया। उसने हमारे परिवार की परंपरा को निभाया है। उसकी शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी।

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Author: Desk

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