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युग हत्याकांड: 2 दोषियों की फांसी उम्रकैद में बदली…एक बरी, 7 साल बाद हाईकोर्ट के फैसले से टूटा परिवार

11 साल पहले शिमला में एक चार साल के मासूम की चीखें दफन हो गई थीं। आज हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले ने उस दर्द को फिर से कुरेद दिया है। चर्चित युग हत्याकांड मामले में 7 साल के लंबे इंतजार के बाद आए फैसले ने सबको चौंका दिया है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई 3 दोषियों की फांसी की सजा को पलटते हुए 2 दोषियों की सजा को आखिरी सांस तक की उम्रकैद में बदल दिया है और एक को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। इस फैसले ने पीड़ित परिवार के इंसाफ के इंतजार को और लंबा कर दिया है।

मंगलवार को हिमाचल हाईकोर्ट के न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश राकेश कैंथला की खंडपीठ ने 235 पन्नों का विस्तृत फैसला सुनाया। खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को बदलते हुए यह अहम निर्णय दिया। दोषी चंद्र शर्मा और विक्रांत बख्शी जोकि युग के पड़ोसी भी थे, उनकाे फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया गया है। अदालत ने माना कि इन दोनों के खिलाफ कठोर सबूत मौजूद हैं। विक्रांत के मोबाइल से युग की तस्वीरें और वीडियो मिले, जिसमें वह आखिरी बार जिंदा दिख रहा था। यह वीडियो उसी किराए के घर का था, जहां युग काे कैद रखा गया था। सबसे बड़ा सबूत यह था कि इन्हीं दोनों ने पुलिस को शिमला के भराड़ी स्थित उस पानी की टैंक का पता बताया था, जहां से 2 साल बाद युग का कंकाल बरामद हुआ। अदालत ने कहा कि वीडियो में जिंदा दिखने के बाद युग का क्या हुआ, इस पर दोषियों की चुप्पी उनके अपराध को दर्शाती है।

तीसरे दोषी तेजिंद्र पॉल को हाईकोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि तेजिंद्र के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है। उसने पुलिस को जो बयान दिया था कि उसने बच्चे को गोदाम में रखने और गत्ते के डिब्बे में ले जाने में मदद की, उससे कोई बरामदगी नहीं हुई। सिर्फ कॉल डिटेल रिकॉर्ड के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि यह साबित नहीं हो सका कि फोन पर क्या बात हुई थी।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मौत की सजा “दुर्लभ से दुर्लभतम” मामलों में ही दी जा सकती है और केवल तभी जब दोषी के सुधरने की कोई गुंजाइश न हो। जेल प्रशासन और मनोचिकित्सा विभाग की रिपोर्ट के अनुसार चंद्र शर्मा और विक्रांत बख्शी का व्यवहार जेल में सामान्य था और उनमें कोई मानसिक बीमारी नहीं पाई गई। अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि युग को बेहद क्रूरता से मारा गया था या उसे पानी के टैंक में जिंदा फैंका गया था। अदालत ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए हम दोषियों के प्रति आक्रोशित हैं, लेकिन सबूतों और कानून के दायरे में रहते हुए हम मौत की सज़ा की पुष्टि नहीं कर सकते।

हाईकोर्ट के इस फैसले से युग के पिता विनोद गुप्ता और उनका पूरा परिवार टूट गया है। नम आंखों से उन्होंने कहा कि हम पिछले 11 वर्षाें से अपने बेटे के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे हैं। जिला अदालत ने तीनों को फांसी दी थी, तो अब ऐसा क्या हो गया कि हाईकोर्ट ने 2 दाेषियाें की सजा कम कर दी और एक को छोड़ दिया? हमें तो फैसले की कोई जानकारी भी नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि वे इस फैसले से असंतुष्ट हैं और न्याय के लिए अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।

यह मामला सिर्फ एक अपहरण और हत्या का नहीं, बल्कि इंसानियत को शर्मसार करने वाली क्रूरता की कहानी है। 14 जून, 2014 काे शिमला के राम बाजार के कारोबारी विनोद गुप्ता के 4 साल के बेटे युग का फिरौती के लिए अपहरण हुआ। आरोपियों ने मासूम युग को एक किराये के मकान में बंधक बनाकर रखा और उसे तरह-तरह की यातनाएं दीं। करीब एक हफ्ते बाद 23-24 जून 2014 की रात आरोपियों ने मासूम युग को पत्थर से बांधकर भराड़ी स्थित नगर निगम के एक पेयजल टैंक में जिंदा फैंक दिया। पुलिस की नाकामी के बाद मामला सीआईडी को सौंपा गया। 2 साल बाद 22 अगस्त 2016 को एक आरोपी की निशानदेही पर उसी पानी के टैंक से युग का कंकाल बरामद हुआ। सबसे भयावह बात यह थी कि दो साल तक उसी टैंक से आसपास के इलाकों में पानी की सप्लाई होती रही और लोग अनजाने में उस पानी का इस्तेमाल करते रहे।

इस खुलासे ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था। लंबी जांच और 100 से ज्यादा गवाहों के बयानों के बाद 5 सितम्बर, 2018 को निचली अदालत ने इसे “दुर्लभ से दुर्लभतम” मामला मानते हुए तीनों दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी, जिसने परिवार को इंसाफ की एक उम्मीद दी थी, लेकिन अब हाईकोर्ट के फैसले ने इस लड़ाई को एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।

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Author: Desk

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