देवभूमि हिमाचल की हवा में आज आस्था की एक अलग ही महक घुली थी। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच मनाली घाटी की आराध्य देवी और कुल्लू राजघराने की दादी माता हिडिंबा अपने लाव-लश्कर के साथ अंतर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव की शान बढ़ाने के लिए रवाना हो गईं। यह एक जीवंत परंपरा का उत्सव है, जिसके बिना कुल्लू का विश्व प्रसिद्ध दशहरा अधूरा है। माता हिडिंबा के गूर (मुख्य पुजारी) देवी चंद ने बताते हैं कि यह एक अटल परंपरा है। जब तक माता हिडिंबा कुल्लू नहीं पहुंचतीं, तब तक दशहरा उत्सव का शुभारंभ नहीं हो सकता। उनके पहुंचने के बाद ही भगवान रघुनाथ जी की भव्य रथयात्रा निकलती है।
बुधवार काे डूंगरी स्थित माता हिडिंबा के प्रांगण में एक अलग ही रौनक थी। वाद्ययंत्रों की धुनें पूरी घाटी में गूंज रही थीं और सैंकड़ों श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा हुआ था। जैसे ही देवी के कारकूनों और देवलुओं ने माता के रथ को उठाया ताे पूरा माहौल “जय माता दी” के जयकारों से गुंजायमान हो गया। माता का रथ जब अपने पारंपरिक मार्ग से होते हुए मनाली के प्रसिद्ध मालरोड पर पहुंचा, तो वहां का दृश्य देखने लायक था। स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों की भीड़ उमड़ पड़ी। हर कोई देवी के इस अलौकिक स्वरूप के दर्शन करने को आतुर था। लोगों ने भक्तिभाव से सिर झुकाया और इस अविस्मरणीय पल को अपने मोबाइल फोन के कैमरों में हमेशा के लिए कैद कर लिया। लाेक निर्माण विभाग के परिसर तक के रास्ते में श्रद्धालुओं ने जगह-जगह रुककर माता से सुख-शांति और समृद्धि का आशीर्वाद लिया।
क्या आप जानते हैं इस परंपरा के बारे में?
कुल्लू दशहरे में माता हिडिंबा की भूमिका सिर्फ एक देवी की नहीं, बल्कि राज परिवार की सम्मानित ‘दादी’ की है। यह परंपरा मानवीय रिश्तों और आस्था का एक अद्भुत संगम है। दशहरे के लिए माता को बुलाने के लिए राजमहल से राजा की छड़ी एक निमंत्रण के रूप में भेजी जाती है। नवमी के दिन माता हिडिंबा का रथ अपने देवलुओं के साथ कुल्लू के रामशिला स्थित हनुमान मंदिर में रात्रि विश्राम करता है। दशमी के दिन जब राजा की छड़ी दोबारा बुलावा लेकर आती है, तब माता का रथ राजमहल में प्रवेश करता है। इस समय एक बहुत ही रोचक और अनूठी रस्म होती है। जैसे ही ‘दादी’ हिडिंबा का रथ महल में प्रवेश करता है ताे राज परिवार के सभी सदस्य सम्मान और संकोचवश अपने-अपने कमरों में छिप जाते हैं। इसके बाद राजमहल में बने देवी के विशेष कक्ष में घोड़ी और शस्त्रों का पूजन किया जाता है। पूजन संपन्न होने के बाद राज परिवार के सदस्य बाहर आते हैं और अपनी दादी के रूप में देवी हिडिंबा से आशीर्वाद ग्रहण करते हैं।








