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शहीद विंग कमांडर नमांश स्याल पंचतत्व में विलीन: मां की चीत्कार सुन रो पड़ा पूरा गांव…पायलट पत्नी ने वर्दी में किया आखिरी सैल्यूट

रविवार की दोपहर नगराेट बगवां की पंचायत पटियालकड़ के वार्ड नंबर-7 में सूरज तो चमक रहा था, लेकिन हजारों आंखों में अंधेरा छाया हुआ था। वहां मौजूद हर शख्स खामोश था, मगर उनकी भीगी पलकें बहुत कुछ कह रही थीं। दोपहर के करीब डेढ़ बजे जब शहीद विंग कमांडर नमांश स्याल का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा हुआ घर पहुंचा, तो सब्र का बांध टूट गया। फिजाओं में गूंजते “भारत माता की जय” और “जब तक सूरज चांद रहेगा, नमांश तेरा नाम रहेगा” के नारों के बीच एक परिवार की दुनिया उजड़ रही थी।

सबसे हृदय विदारक दृश्य शहीद की मां बीना देवी का था। जिस बेटे की एक झलक पाने के लिए वह बेसुध हुई जा रही थीं, उसके पार्थिव शरीर के पास बैठकर वह अतीत के पन्नों को पलट रही थीं। रोते-बिलखते मां के शब्द वहां मौजूद हर पत्थर दिल को भी पिघला रहे थे। वह कह रही थीं कि “मेरा नमू पूछता था कि मां आज क्या बनाया है? आपने खाना खाया या नहीं?” अब ये सवाल पूछने वाली आवाज हमेशा के लिए शांत हो चुकी थी। मां की चीख-पुकार सुनकर वहां मौजूद सेना और पुलिस के जवानों की आंखें भी छलछला उठीं।

शहीद के पिता जगन्नाथ जो अपने बुढ़ापे के सहारे को कांधा देने के लिए मजबूर थे, बेटे को देख फूट-फूट कर रो पड़े। वह बार-बार अपने रिश्तेदारों और परिवार के लोगों से लिपट रहे थे, जैसे यकीन ही न कर पा रहे हों कि उनका जिगर का टुकड़ा अब नहीं रहा। रिश्तेदार उन्हें ढांढस बंधा रहे थे, लेकिन एक पिता के लिए यह वज्रपात किसी दिलासे से कम नहीं हो सकता था।

गम के इस पहाड़ के बीच शहीद की पत्नी अफशान अख्तर ने अदम्य साहस का परिचय दिया। खुद वायुसेना में पायलट अफशान ने सेना की वर्दी पहनकर अपने शहीद पति को अंतिम सैल्यूट किया। जिस हमसफर के साथ उन्होंने सात फेरे लिए थे, आज उसी साथी को वायुसेना के साथियों के सहारे अंतिम सफर पर भेज रही थीं। नमांश अपने पीछे 7 साल की मासूम बेटी आर्या को भी छोड़ गए हैं, जिसके सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया।

दोपहर 3:30 बजे जब अंतिम यात्रा श्मशानघाट की ओर बढ़ी तो जनसैलाब उमड़ पड़ा। हजारों की संख्या में लोग अपने हीरो को विदा करने आए थे। श्मशानघाट पर भारतीय वायु सेना की टुकड़ी ने सैन्य सम्मान के साथ सलामी दी। अंत में शहीद के ताया के बेटे निशांत स्याल ने कांपते हाथों से मुखाग्नि दी और नमांश पंचतत्व में विलीन हो गए। नगरोटा का यह लाल चला गया, लेकिन अपने पीछे छोड़ गया कभी न भरने वाला शून्य और एक राष्ट्रभक्ति की अमिट छाप।

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Author: Desk

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