जरा सोचिए… आपके पैरों के नीचे जमीन खिसक रही हो, सामने हजारों फुट गहरी खाई मुंह खोले खड़ी हो और आप लोहे की एक भारी-भरकम मशीन में कैद हों। धड़कनें रुक जाती हैं न? लेकिन हम आपको एक ऐसे जांबाज की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसने मौत की आंखों में आंखें डालकर अपनी जिंदगी छीन ली।
यह तस्वीर हिमाचल के चम्बा जिले की है। भरमौर की वादियां जितनी खूबसूरत हैं, उतनी ही जानलेवा भी। लूणा-छतराड़ी रोड पर चचियां गांव के पास सड़क बनाने का काम चल रहा था। सब कुछ सामान्य था कि तभी अचानक… गुरुत्वाकर्षण ने अपना खेल दिखाया। हजारों टन वजनी जेसीबी का संतुलन बिगड़ा। मशीन सड़क से फिसली और सीधे खाई की तरफ लुढ़कने लगी। वो पल… शायद एक सैकेंड का रहा होगा, लेकिन उस ऑप्रेटर के लिए वो एक सदी जैसा था। आम इंसान होता तो चीख पड़ता, स्टीयरिंग छोड़ देता या शायद कूदने की कोशिश करता… जोकि जानलेवा होता, लेकिन यहां काम आया वह तजुर्बा, जो किताबों में नहीं मिलता। गिरती हुई मशीन में बैठे ऑप्रेटर ने अपना आपा नहीं खोया। उसने मशीन के लीवर्स पर अपनी उंगलियां नचाईं और लोहे के उस ‘बकेट’ (पंजे) को ढाल बना दिया।
उसने तुरंत जेसीबी का आगे का बकेट पूरी ताकत से जमीन में गाड़ दिया। मशीन को एक झटका लगा और वो वहीं जम गई, लेकिन खतरा टला नहीं था… मशीन फिर खिसक सकती थी। उसी पल, बिजली की फुर्ती से उसने पीछे का हिस्सा भी जमीन में धंसा दिया। पहाड़ी की ढलान पर मौत और जिंदगी के बीच… वह मशीन अब एक स्टैच्यू की तरह खड़ी थी। यह सिर्फ एक मशीन के बचने की कहानी नहीं है और न ही सिर्फ लाखों के नुक्सान के टलने की खबर है। यह कहानी है उस ‘प्रैजेंस ऑफ माइंड’ की है, जिसके दम पर हम इंसान इन पहाड़ों का सीना चीरकर रास्ता बनाते हैं।
ऑप्रेटर सुरक्षित है। उसे खरोंच तक नहीं आई, लेकिन जब वो अपने घर जाएगा, अपने बच्चों को गले लगाएगा तो शायद वो उस ‘बकेट’ का भी शुक्रिया अदा करेगा, जिसने उसे दूसरी जिंदगी दी है। हम सलाम करते हैं उस ऑप्रेटर के हुनर और हिम्मत को, जिसने साबित कर दिया कि मुसीबत कितनी भी बड़ी हो अगर हौसला मजबूत हो तो गहरी से गहरी खाई भी आपको निगल नहीं सकती।








