हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के नाहन में एक ऐसा भावुक दृश्य देखने को मिला, जिसने समाज की पुरानी और जड़ जमा चुकी मान्यताओं को झकझोर कर रख दिया। जहां वर्षों से अंतिम संस्कार और मुखाग्नि देने की परंपराएं केवल बेटों तक सीमित मानी जाती रही हैं, वहीं नाहन शहर में एक बेटी ने पुरानी परंपराओं को तोड़ते हुए अपनी मां की अर्थी को कंधा दिया। बेटी ने सिर पर सफेद कपड़ा बांध कर पूरे विधि-विधान के साथ अपनी मां की चिता को मुखाग्नि दी और समाज को सोच बदलने का एक मजबूत संदेश दिया।
यह साहसिक कदम उठाने वाली बेटी डॉ. अनिकेता हैं, जो नाहन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने अपनी 75 वर्षीय मां को यह खास अंतिम विदाई दी, जो एक सरकारी स्कूल से सेवानिवृत्त प्रिंसिपल थीं। सिर पर सफेद कपड़ा बांधे और नम आंखों के साथ, लेकिन चेहरे पर दृढ़ भाव लिए डॉ. अनिकेता द्वारा मां को दी गई यह विदाई वहां मौजूद हर व्यक्ति को भावुक कर गई। यह केवल एक अंतिम संस्कार नहीं था, बल्कि परंपरा और बदलाव के बीच स्थापित हुआ एक नया संतुलन था।
जानकारी के अनुसार, डॉ. अनिकेता और उनकी मां के बीच बेहद गहरा भावनात्मक जुड़ाव था। उनकी मां लंबे समय से बीमार चल रही थीं। पिछले दो वर्षों में डॉ. अनिकेता ने एक साथ दोहरी जिम्मेदारियां निभाईं। वह दिन में अस्पताल में मरीजों की सेवा करती थीं और रात में अपनी बीमार मां की देखभाल में जुटी रहती थीं। कई बार हालात ऐसे भी बने जब उन्हें अस्पताल में ही अपनी मां के साथ रातें गुजारनी पड़ीं। उनका यह समर्पण केवल एक कर्तव्य नहीं था, बल्कि मां-बेटी के रिश्ते की असीम गहराई को भी दर्शाता है।
अंतिम संस्कार के इस भावुक क्षण में डॉ. अनिकेता की दोनों बेटियां और उनकी बहन भी वहां मौजूद थीं, जो इस ऐतिहासिक बदलाव की गवाह बनीं। खुद दो बेटियों की मां होने के नाते डॉ. अनिकेता का यह कदम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने समाज को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि बेटियां जीवन की हर भूमिका निभाने में सक्षम हैं, चाहे वह परिवार की देखभाल करना हो या जीवन के सबसे कठिन क्षणों में बड़े निर्णय लेना। उनके अनुसार, माता-पिता के लिए संतान का बेटा या बेटी होना मायने नहीं रखता, बल्कि यह मायने रखता है कि वह अपने कर्तव्यों और रिश्तों को कितनी ईमानदारी के साथ निभाती है।
नाहन के मोक्षधाम में हुआ यह अंतिम संस्कार अब महज एक घटना नहीं रह गया है, बल्कि इसे एक बड़े सामाजिक बदलाव की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। बेटी द्वारा निभाई गई इस जिम्मेदारी ने समाज के सामने एक ऐसा प्रेरणादायक उदाहरण पेश किया है, जो आने वाले समय में कई परिवारों को रूढ़िवादी और पुरानी सोच से बाहर निकलने की राह दिखाएगा।







